कुंडलिनी जागरण || शरीर संरचना और मन

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सृष्टी रचयिता ने सत , रज व तम आदि तीन गुणों के समन्वय से चराचर जगत की रचना की और जीवों को चार शरीरों में विभक्त किया | ( शरीर संरचना और मन )

इनमे जेर ( झिल्ली ) से पैदा होने वालों को जेरज कहा गया जैसे मनुष्य , पशु आदि | अंडो से उत्पन्न होने वालो को अंडज कहा गया जैसे पक्षी |( शरीर संरचना और मन )

स्वेद ( पसीने ) से उत्पन्न होने वालो को स्वेदज कहा गया जैसे जूं आदि | इसी तरह धरती फोड़कर उत्पन्न होने वालो को उद्भिज कहा गया जैसे पेड़ पोधे आदि वनस्पति |

इन सबमे मनुष्य योनी जो जेरज कहलाती है , श्रेष्ठ है | मनुष्य का चर्म चक्षुओ से दिखाई देने वाला शरीर 20 तत्वों से बना है | ये है –

पांच ज्ञानेन्द्रिया ( आँख , कान , नाक , जिव्हा व त्वचा ) ; पांच कर्मेन्द्रिया ( हाथ , पैर , गुदा , उपस्थ व मुह ) ; पांच ज्ञानेन्द्रिया के विषय ( शब्द , रूप , रस , गंध , स्पर्श ) तथा पांच तत्व ( अग्नि , जल , वायु , आकाश , मिटटी )

इन 20 तत्वों से बना शरीर स्थूल शरीर कहलाता है | स्थूल शरीर के बाद सूक्ष्म शरीर होता है जो बनावट में स्थूल शरीर की भाँती ही होता है | अंतर केवल यह होता है की उसमे मन , बुद्धि , चित्त ,अहंकार का समन्वय होता है और वह श्वेत धूम ( धूम्र या धुएं ) के कणों से बना होता है |( शरीर संरचना और मन )

सूक्ष्म शरीर के बाद कारण शरीर होता है जो अंगूठे के आकार का होता है और सदेव दीपक के लो की भाति प्रकाशमान रहता है | इसका निर्माण कर्मफलो से होता है | अतिसूक्ष्म शरीर चेतन्य होता है , जिसे आत्मा कहते है |( शरीर संरचना और मन )

इस प्रकार जिन इकाइयों से मिलकर यह मानव शरीर बनता है उनमे प्रमुख इकाई आत्मा है | इसी को चेतन्य शक्ति कहा जाता है | इसी क परमात्मा का अंश भी कहा जाता है | परमात्मा समष्टि है तो आत्मा व्यष्टि रूप से चराचर जगत के जीवो में वास करती है |( शरीर संरचना और मन )

शरीर में मन दूसरी प्रमुख इकाई है जो आत्मा और भोतिक शरीर के मध्य समन्वय का कार्य करता है | शरीर की जितनी भी क्रियाये होती है वे सब मन ही आत्मा से उर्जा ग्रहण कर संचालित करता है | यदि मन निष्क्रिय हो जाए तो शारीरिक क्रियाये भी शिथिल पड़ जाती है |( शरीर संरचना और मन )

शरीर की तीसरी प्रमुख इकाई स्थूल शरीर है | यह स्थूल शरीर ही इन्द्रियों के माध्यम से कर्मो को संपादित करता है | यह जड़ होने के कारण मन के आदेशो का पालन यंत्रवत करता है |

अव्यक्त प्रकृति ही कारण शरीर है जिसमे आत्मा का वास है | इस कारण शरीर में “ मैं “ की जो अनुभूति होती है वही अहंकार है | संकल्प विकल्प की वृति मन है | किसी भी वस्तु या पर्दार्थ का निर्णय करने वाली वृति बुद्धि है | चिंतन करने वाली वृति चित्त है | ( शरीर संरचना और मन )

इन चारो से अन्तकरण बनाता है | चित्त में संकल्प विकल्प उत्पन्न होते है , अहं भाव से कामना वासना उत्पन्न होती है , जिसकी पूर्ति के निमित्त सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है | यह आत्मा का ही रूप होता है | लेकिन यह स्वयं को आत्मा से भिन्न समझता है और जिव कहलाता है | आत्मा के कार्य व्यापार को यही जीव करता है |

इस प्रकार सारे तत्व अपने अपने कार्य करते है | इन सब तत्वों का जो स्वरूप बनता है वही स्थूल या भोतिक शरीर है | इस तरह शरीर संरचना का मूल कारण चित का संकल्प है | चित के संकल्प के कारण ही मन में वासनाए है | चित्त मन का अचेतन ताल कहलाता है | लेकिन कुछ लोग चित्त व मन को एक ही समझते है |

मन क्या है ?

यहाँ तक शरीर की संरचना की बात कही गयी है | अब प्रशन उठता है की मन क्या है ? उसका स्वरूप क्या है ? इसका उत्तर यह है की मन चेतन आत्मा की अभिव्यक्ति है अतार्थ उसी का अन्य रूप है | मन ही वासनापूर्ति के निमित सूक्ष्म शरीर रचता है |

प्रकृति के तत्वों में समन्वय करने का काम यह मन ही करता है | जब मन संसार के कार्यो की और उन्मुख होता है तब ज्ञानेन्द्रियो के माध्यम से संसार को भोगता है और अज्ञान के कारण यह आत्मा को भूल जाता है | जब इसकी वृतियो को रोक दिया जाता है तब अज्ञान नष्ट हो जाता है |

इस तरह मनोनिग्रह द्वारा योग होता है | मनुष्य जीवन का लक्ष्य अपने स्वरूप को जानना है और यह तभी संभव है जब मन का निग्रह कर दिया जाये |

समष्टि रूप में मन ही बह्मा कहलाता है जो व्यष्टि रूप में मानवीय क्रिया कलापों का यह कारण बनता है | सारत चेतन्य में जब संकल्प शक्ति का स्फुरण होता है तब वही मन कहलाता है | इस तरह देखा जाए तो मन का संकल्प ही शरीर संरचना का प्रमुख कारक है | स्मृति भी मन का ही एक रूप है |

ध्यान की और कदम बढ़ाने से पूर्व मन पर नियंत्रण पाना अति आवश्यक है | इसीलिए योग ग्रंथो में यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार आदि की अवधारणा की गयी है |

यही कारण है की ध्यान में सक्षम होने के लिए शिथिलीकरण के अभ्यास पर बल दिया जाता है ताकि स्नायविक तनाव कम हो | इन सबके मूल में मन ही है , जिसका निग्रह करके ही ध्यान मार्ग में आगे बढ़ा जा सकता है अन्यथा ध्यान की कल्पना भी बेमानी रह जायेगी |

( शरीर संरचना और मन )

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