कुंडलिनी जागरण

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विषय सूची ( कुंडलिनी जागरण )

1. शरीर संरचना व मन
2. मन को वश में कैसे करे
3. शरीरस्थ पंचकोश
4. योग चतुष्टय के सिदान्त
5. योग के आठ अंग

6. ध्यान योग और ध्यान की महिमा
7. ध्यानयोग के लिय आवश्यक बातें
8. ध्यान की विधिया
9. ध्यान साधना में आने वाले विघ्न
10. प्राणायाम और प्राण

11. प्राणायाम का प्रभाव व महत्व
12. प्राणायाम प्रभेद व मुद्राए
13. प्राणापान का सम्मिलन
14. पञ्च तत्वों की अवधारणा
15. योगासनों से पूर्व कुछ सावधानिया

16. योग संबंधी विभिन्न आसन
17. कुण्डलिनी : एक परिचय
18. नाडिया एवं कुण्डलिनी
19. चक्रों का परिचय
20. मूलाधार चक्र

21. स्वाधिष्ठान चक्र
22. मनिपुरक चक्र
23. अनाहत चक्र
24. विशुद्ध चक्र
25. आज्ञा चक्र

26. सहस्त्रार चक्र
27. कुण्डलिनी जागरण के उपाय

यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान व समाधि आदि योग के आठ अंग है | ये राजयोग या राजविद्या के भी अंग है जो अतिगुढ़ विद्या कहलाती है | इनमे से यम , नियम , आसन , प्राणायाम व प्रत्याहार बाह्य अंग है अतार्थ बाहरी क्रिया है जबकि धारणा , ध्यान व समाधि अंत करण की क्रियाए है | इनमे भी अंतिम यानी समाधि ध्यान की पराकाष्ठा है |(कुंडलिनी जागरण)

मूल विषय ध्यान व प्राणायाम है जो वास्तव मैं योग के ही अंग है | योग शब्द यूज समाधौ धातु से बना है इसका तात्पर्य समाधि है | योग शब्द युजिर योगे धातु से भी बनता है जिसका अर्थ है जुड़ना | यानी आत्मा का परमात्मा से जुड़ना | सार रूप में जिव भाव का विलोप करके ब्रह्म भाव में समां जाना ही वास्तविक योग है |(कुंडलिनी जागरण)

परमात्मा की यह सृष्टी युग्ममय है | यह हर एक का जोड़ा है | जैसे सयोग के साथ वियोग , स्त्री के साथ पुरुष , सुख के साथ दुःख , सुबह के साथ शाम , दिन के साथ रात | हमारे मनीषियों ने योग पर गहन मनन करने के बाद निष्कर्ष रूप में योग को मानव जीवन का अभिन्न अंग बतलाया है |(कुंडलिनी जागरण)

मानव परमात्मा तक कैसे पहुचे ? इसका मार्ग योग में बतलाया गया है जिसकी प्रारम्भिक सीढ़ि यम है तो अंतिम सीढ़ि समाधि है | अंतिम सीढ़ि समाधि तक पहुचने के लिए ही पूर्वर्ती सात साधन बतलाये गए है जिनमे से चोथा और सातवा साधन अतिमहत्वपूर्ण है | समाधि तक पहुचने के लिए ध्यान आवश्यक है और ध्यान तक पहुचने के लिए यमाधि आवश्यक है | इन सबसे महत्वपूर्ण है चित की एकाग्रता |(कुंडलिनी जागरण)

चित बड़ी कठिनता से एकाग्र हो पाता है |
ध्यान की सिद्धी के लिए यम नियमो द्वारा चित को एकाग्र करना आवश्यक है इसलिए महर्षि पतंजलि ने चितवर्ती का निरोध कर स्वरूप में स्तिथ होने को ही योग कहा है यथा योग निश्चित व्रती निरोध तदा द्र्श्तु स्वरूप अवस्थाम
योगियों की अनेक शाखाये प्राचीन काल से ही चली आ रही है |(कुंडलिनी जागरण)

यथा पातज्जल योग , मार्कडेय योग , नाथ योग , राजयोग आदि | लेकिन अधिकतर योग परम्पराए भगवान शिव से ही प्रारम्भ हुयी है | यही कारण है की आज भी भगवान शिव को ध्यान मुद्राओ में ही दर्शाया जाता है |
संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ने भी भगवान शिव के निज रूप में समाधिस्थ रहने की बात अनेक बार कही है |(कुंडलिनी जागरण)

तुलसीदास एक स्थान पर लिखते है की जब भगवान शिव को समाधिस्थ हुए दिव्य ८७ हजार वर्ष बीत गए , तब उन्होंने समाधि का त्याग किया |(कुंडलिनी जागरण)
यथा –

बीतें संवत सहस सतासी | तजि समाधी संभु अविनासी |

ध्यान , योग व प्राणायाम के माध्यम से स्वस्थ चित रहकर मानव अपना कल्याण का सके तथा आधि – व्याधियो से सर्वथा मुक्त रहे | यही वर्तमान काल अतार्थ आपा – धापी के इस युग में परम आवश्यक है

आज विभिन्न योगिक केन्द्रों का ध्येय भी यही है की मानव योग को अपनाकर स्व्स्थकाय हो क्युकी स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी दोलत है | स्वस्थ मानव ही अपना यह लोक ओ परलोक सुधारने में सक्षम हो सकता है | धर्म , अर्थ ,, काम , मोक्ष आड़ चारो पुरुषार्थो की लब्धि भी तभी संभव है जब शरीर स्वस्थ रहे |

प्राणायाम व ध्यान योग के ही अंग है | ध्यान जहा अन्तकरण का विषय है , वही प्राणायाम श्वासों की बाह्य क्रिया है | प्राणायाम ए मन निर्मल होकर शरीर निरोगी होता है वही ध्यान के माध्यम से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है | ये दोनों ही क्रियाये आज मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग बन चूका है | इन क्रियायो के प्रचार प्रसार में संचार माध्यम इन दिनों महत्वपूर्ण भुमका निभा रहे है |(कुंडलिनी जागरण)

सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामय
भद्राणि पश्यंतु में कशिच्द भागभवेत |

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