कुंडली जागरण 5 – योग के 8 अंग

समाधी तक पहुचने के लिए यम नियमादी के पालन की आवश्यकता होती है | इनके पालन में चुक होने पर न ध्यान होता है और न समाधी लग पाती है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

समाधी तक पहुचने के लिए यम नियमादी के पालन की आवश्यकता होती है | इनके पालन में चुक होने पर न ध्यान होता है और न समाधी लग पाती है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

केवल नियमो का पालन किया जाये  और यमो का पालन न किया जाये तब भी सिद्धी प्राप्त नहीं होती | मनुस्मृति में मनु महाराज ने ध्यान व समाधी के लिए यमो व नियमो दोनों के पालन की आवश्यकता बतलाई है | यथा –

यमान सेवेत सतंत न नित्य नियमान बुध |

यमान प्तत्यकुर्वानो नियमान केवलान भजन ||

अतार्थ बुधिमान व्यक्ति यमो का सतत पालन करता हुआ ही नियमो का पालन करे , न की केवल नियमो का ही | जो यमो का पालन न करके केवल नियमो का ही पालन करता है वह साधना पथ से भटक जाता है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

इसलिए यम नियमो का पालन किये बिना ध्यान व समाधी का सिद्ध होना दुष्कर है |

योगदर्शन में योग के 8 अंग इस प्रकार बताये गए है –

यमनियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणाध्यान स्माधयोस्तावंगानी

अतार्थ यम, नियम, आसन, प्राणायाम , प्रत्याहार , ध्यान,धारणा, व समाधी | इनमे से प्रारंभिक पांच अंग बाह्य साधना के अंग है | जबकि शेष तीन अन्तरंग साधना के अंग है | महर्षि पतंजलि ने धारणा , ध्यान , समाधी , को सयंम भी कहा है |

 योग के इन 8 अंगो का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है –कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग

यम –

योगदर्शन में अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य , व अपरिग्रह को यम कहा गया है | यथा – अहिंसासत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रह यमाः |

अहिंसा –

मन , वचन , कर्म या देहिक दर्ष्टि से किसी भी जीवधारी को कष्ट न पहुचाना अहिंसा है | अहिंसा से वेर भाव समाप्त हो जाते है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

सत्य –

शास्त्रीय सिदान्तो की रक्षार्थ जो कुछ कहा जाये अथवा मन , वचन , कर्म से यथार्थ की अभिव्यक्ति ही सत्य है | सत्य से वाणी की सिद्धी होती है |

अस्तेय –

किसी भी अन्य के धन का अपहरण न करना अतवा मन , वचन , देह द्वारा किसी के हक़ को न छिनना अस्तेय है | अस्तेय से वांछित वस्तु प्राप्त होती है |

ब्रह्मचर्य –

जननेंद्रिय के नियंत्रण को ब्रह्मचर्य कहते है अथवा मन , शरीर , इन्द्रियों द्वारा होने वाले काम विकार का अभाव ही ब्रह्मचर्य है | ब्रह्मचर्य से वीर्य लाभ होता है जो बल व शक्ति का भी सूचक है |

अपरिग्रह –

भोग वस्तुओ का संग्रह न करना अपरिग्रह है | अपरिग्रह से अतीत , वर्तमान , भावी जन्मो का ज्ञान हो जाता है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

नियम –

योग दर्शन में शोच , संतोष , तप , स्वाध्याय व इश्वर प्रणिधाम को निया कहा गया है | यथा –

शोचसंतोषतप स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानी नियमाः |

शोच – शोच का अर्थ पवित्रता या शुचिता है | पवित्रता दो तरह की होती है – बाह्य व अभ्यंतर | मिटटी या जल से शरीर को शुद्ध करना बाह्य शोच कहलाता है | जबकि अहंता , इर्ष्या , द्वेष , काम – क्रोधाधि का त्याग आभ्यंतर शोच कहलाता है | भीतर बाहर की पवित्रता से सोमनस्य आता है , जिससे एकाग्रता बढती है और आत्मा साक्षात्कार की योग्यता भी साधक में आ जाती है |

संतोष – जो कुछ भी उपलब्ध है उससे अधिक की कामना न करना ही संतोष है | संतोष सबसे बड़ा धन है | इसके आगे संसार के सभी धन तुच्छ है दुसरे अर्थो में प्रसन्नचित रहना ही संतोष का परिचायक है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

तप – भूख प्यास , सर्दी गर्मी , द्वंद को सहन करना , व्रत करना आदि ये सभी तप है | तप करने का लाभ यह होता है की साधक में सूक्ष्मातिसूक्ष्म व दूर की वस्तुओ को देख लेने की क्षमता का विकास होता है | साथ ही श्रवण शक्ति भी बलवती हो जाती है |

स्वाध्याय – वेद पुराण , सदग्रंथो का अध्यनन भगवान के नामो का उच्चारण करना , मंत्र का जप करना आदि  स्वाध्याय कहलाता है | स्वाध्याय करने से इष्टदेव के दर्शनों का लाभ होता है |

इश्वर प्रणिधान – मन , वाणी , शरीर से इश्वर के प्रति समर्पण भाव ही इश्वर प्रणिधान कहलाता है | इसका लाभ समाधी के रूप में प्राप्त होता है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

आसन –

योगदर्शन में आसन उसे कहा गया है जिसमे दीर्घकाल तक सुखपूर्वक सिथिरता से बैठा जा सके | ये कई तरह के होते है, जिनमे प्रमुख है – सिद्धासन , सुखासन , पद्मासन , स्वस्तिकासन आदि | तीन घंटे तक एक ही आसन में सुखपूर्वक बैठने को आसन सिद्धी कहते है |

प्राणायाम –

आसन सिद्ध होने पर श्वास प्रश्वास का विच्छेदन होने पर गति का भी विच्छेदन करना प्राणायाम कहलाता है | इसके तीन भेद होते है – रेचक , पूरक व कुम्भक | प्राणायाम करने से सभी दोषों का निवारण होता है तथा चित शुद्ध हो जाता है |

अधिक स्पष्ट रूप में कहा जा सकता है की बाहर की वायु भीतर प्रवेश करे तो उसे श्वास कहा जाता है जबकि भीतर की वायु बाहर निकले तो उसे प्रश्वास कहा जाता है | इन दोनों ही वायुओ को रोकने का नाम ही प्राणायाम है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

योगदर्शन में कहा गया है की –

बाह्य्भ्यंतरस्तभवृतिदेर्शकालसंख्याभिः परीदर्श्तो दिर्घसुक्षम |

अथार्त देश , काल की द्रष्टि से बाह्य , अभ्यंतर व स्तंभ वृति वाले ये तीन प्राणायाम दीर्घ व सूक्ष्म होते है | इसको अधिक स्पष्ट करते हुए कहा गया है की भीतरी श्वास को बाहर निकालकर ही रोके रखने को बाह्य कुंभक प्राणायाम कहते है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

इसी तरह बाहर के श्वास को अंदर खीचकर भीतर ही रोके रखना अभ्यंतर कुंभक प्राणायाम कहलाता है | लेकिन बाहर या भीतर कही भी श्वास को सुखपूर्वक रोक लेना स्त्म्भवृति प्राणायाम कहलाता है |

एक बात और स्पष्ट समझना आवश्यक है की प्राणवायु का नाभि , ह्रदय , कंठ या नासिका के भीतर के तक का भाग अभ्यंतर देश है | नासिका छिद्रों से बारह सोलह अंगुल तक का भाग बाह्य देश कहलाता है |इसी तरह भीतर बाहर के विषयों के त्याग से होने वाला केवल कुंभक चोथा प्राणायाम कहलाता है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

प्राणायाम से अज्ञानता व पापो का शमन होता है | मन में सिथिरता आती है |

प्रत्याहार –

इन्द्रियों क निज विषयों से विमुख होकर चित के स्वरूप का अनुकरण करना या उसी में अवस्तिथ हो जाना प्रत्याहार कहलाता है | यथा –

स्वविषयासंप्रयोगे चित्स्वरुपनुकर इवेंद्रियाना प्रत्याहार |

यहाँ यह समझ लेना चाहिए की इन्द्रियों का अवरोध चित ही है और जब चित ही रुक जाये तो फिर इन्द्रिया भी स्वत अवरुद्ध हो जाएगी | प्रत्याहार का सबसे बड़ा लाभ यह होता है की साधक को बाहर का ज्ञान नहीं रहता | इन्द्रिय वशीभूत हो जाती है |

धारणा –

योग के वर्णित 5 अंग बाहर के साधन है | शेष 3 अंत साधन है | इनमे भी धारणा प्रमुख है | आत्मा से ही ध्यान व समाधी तक पहुचा जा सकता है | धारणा क्या है ? चित को नाभि चक्र , नासिकाग्र ,ह्र्त्पुंडरिक में एकाग्र कर लेना ही धारणा है अतवा एक देश विशेष भाग में चित को स्थिर कर लेना ही धारणा है | धारणा का अभ्यास करने से मन भी एकाग्र होने लगता है और ध्यान में साधक को सफलता मिलती है |( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

ध्यान –

ध्येय वस्तु में चित्वृति की एकाग्रता ही ध्यान है अथार्त ध्येय वस्तु में तेल धारावत मन को अनवरत लगाये रखना ही ध्यान है | धारणा विभिन्न देशो या भागो में होती है जबकि ध्यान तेल धारावत अविच्छिन्न होता है | इसलिए ध्यान के संदर्भ में योगदर्शन में कहा गया है की –

तत्र प्रत्य्येक्तानता ध्यानम |

समाधी –

जब ध्याता को न ध्येय वस्तु का ध्यान रहे और न ही स्व का ज्ञान रहे तब समाधि अवस्था होती है अथार्त समाधी में ध्येय , ध्यान , ध्याता का लोप हो जाता है | सतत अभ्यास के बाद ये तीनो ही एकाकार हो जाते है | समाधी का प्रमुख लक्ष्य केवलय अथार्त मोक्ष पाना होता है | समाधि के सन्दर्भ में योगदर्शन में कहा भी गया है की –( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )

तदेवार्थमात्रनिर्भास स्वरूपशून्यमिव समाधिः |

( कुंडली जागरण 5 योग के 8 अंग )
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