कृष्णा का अर्जुन को उपदेश

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जब श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा में ही ईश्वर हु पार्थ
तब श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा
कृष्णा का अर्जुन को उपदेश

सब परिणाम परित्यज है
मामे शरणं वर्ज

सारे जगत का त्याग करके मेरी शरण में आ जाओ पार्थ | में ही संसार हु , में ही संसार का प्रत्येक कण हु , में ही सूर्य हु और में ही चन्द्र हु , में ही नक्षत्र हु और में ही सब ग्रह हु , में सूर्य से भी अधिक पुरातन हु और किसी व्रक्ष पर खिली कलि से भी नया हु , में ही सारे मनुष्य हु , में ही स्वर्ग और नरक को धारण करने वाली शक्ति हु , में ही दुर्योधन हु और में ही अर्जुन भी
( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

मेरे अनेक जन्म हुए है पार्थ , मैंने अनेको अवतार धारण किये है , कई शरीर बने है मेरे और इसी मिटटी में मिले है और आगे भी में बार बार जन्म लूँगा( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

“ यदा यदा ही धर्मस्य , ग्लानिर भवती भारत”
“ अब्युथानम धर्मस्य , तदात्मान सर्जाम्ह्यम”
“परित्राणाय साधुना विनाशाय च दुष्कृताम”
“धरमसंस्थापनाथार्य संभवामि युगे युगे”

जब जब धर्म को हानि होती है , जब जब धर्म में अवर्धि होती है तब तब सत्पुरुषो के उद्धार के लिए , अधर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए मैं ही जन्म लेता हु ये प्रत्येक युग में होता आया है और आगे भी ऐसा होगा |

में ही अविनाशी परमात्मा हु , में ही भिम्त्श्य पिता और में ही वामन अवतार हु , में ही परशुराम हु और में ही राम चन्द्र भी था , में ही ब्रह्मा , विष्णु , महेश हु और में ही सरस्वती , काली और लक्ष्मी भी | में ना पुरुष हु ना स्त्री हु और ना ही नपुंशक | में ना शरीर हु ना शरीर के अंग हु | ( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

में ज्ञान हु , श्रष्टि हु , चेतन्य हु और परब्रह्म हु , में सब कुछ हु और में ही कुछ भी नही हु मैं पृथ्वी की मूल सुगंध हूं, और मैं अग्नि की गर्मी हूं। मैं सभी का जीवन हूं और मैं सभी तपस्वियों की तपस्या हूं हे पार्थ जान लो कि मैं सभी अस्तित्वों का मूल बीज हूं, बुद्धिमानों की बुद्धि और सभी शक्तिशाली पुरुषों की कामना।में ही सारे जीवो का ब्रह्म बीज हु और में ही बुधिमानो की बुद्धि हु में ही बलवानो का बल हु पार्थ |( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

में पृथ्वी के कण कण में वास करता हु | सारी पृथ्वी , सूर्य , चन्द्र , समस्त ब्रह्मांड मेरे भीतर वास करते है हे कुंती [अर्जुन] के पुत्र, मैं जल का स्वाद, सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश, वैदिक मंत्रों में शब्दांश ओम; मैं मनुष्य में ईथर और क्षमता में ध्वनि हूँ। मैं मजबूत, जोश और इच्छा से रहित हूं। ( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

मैं यौन जीवन हूं जो धार्मिक सिद्धांतों के विपरीत नहीं है, हे भारत के भगवान [अर्जुन] होने की सभी अवस्थाएँ – वे भलाई, जुनून या अज्ञानता की हैं — मेरी ऊर्जा से प्रकट होती हैं। मैं एक अर्थ में, सब कुछ हूं — लेकिन मैं निर्दलीय हूं। मैं इस भौतिक प्रकृति के तरीकों के अधीन नहीं हूंतीन मोड [भलाई, जुनून और अज्ञानता] के कारण, पूरी दुनिया मुझे नहीं जानती है कि मैं मोड और अटूट से ऊपर हूं।

तो भगवान कृष्ण कहते हैं कि पुरुष, प्रकृति के इन तीन तरीकों से बहक गए, यह नहीं समझते कि भौतिक पृष्ठभूमि के पीछे सर्वोच्च देवता हैं कई अलग-अलग प्रकार की जीवित संस्थाएं हैं- मनुष्य, देवता, जानवर, आदि-और उनमें से हर एक भौतिक प्रकृति के प्रभाव में है, और वे सभी देवत्व के पारलौकिक व्यक्तित्व को भूल गए हैं। जो लोग जुनून और अज्ञानता के मोड में हैं, ( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

और यहां तक कि जो अच्छाई के मोड में हैं, वे पूर्ण सत्य के अवैयक्तिक ब्राह्मण गर्भाधान से परे नहीं जा सकते हैं। वे अपनी व्यक्तिगत विशेषता में सर्वोच्च प्रभु के सामने हतप्रभ हैं, जिसमें सभी सुंदरता, अस्पष्टता, ज्ञान, शक्ति, प्रसिद्धि और त्याग हैं।जब भलाई करने वाले भी समझ नहीं पाते हैं, ( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

तो जुनून और अज्ञानता में उन लोगों के लिए क्या उम्मीद है?कृष्ण चेतना भौतिक प्रकृति के इन तीनों साधनों से पारलौकिक है, और जो वास्तव में कृष्ण चेतना में स्थापित हैं, वे वास्तव में मुक्त हैं।

ऐसा प्रत्येक युग में हुआ है और ऐसा ही आगे भी होता रहेगा |( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

( कृष्णा का अर्जुन को उपदेश )

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