जीवन का रहस्य

Posted on

आइये हम जानते है जीवन का रहस्य ( Jivan Ka Rahsya )

संसार की बड़ी विचित्र दशा है मनुष्य जन्मता है बड़ा होता है विषय भोग करता है संतान उत्पन्न करता है पालन पोषण करता है धन जमीन मकान तथा अन्य भोग की सामग्री एकत्रित करता है और इनके संग्रह मैं न्याय और अन्याय की परवाह नहीं करता है और अंत मैं इन सभी को यही छोड़कर असफलता प्राप्ति का बोध करता हुआ चिंता और पाप का बोझ सिर पर लिए हुए इस असार संसार से चला जाता है |( Jivan Ka Rahsya )

अधिकांश मनुष्यों की यही दशा है | इस प्रकार के जीवन मैं और पशु जीवन मैं क्या अंतर है ?
पशु भी अपना पेट भरता है संतान उत्पन्न करते है और अंत मैं मर जाते है | बल्कि कई बातो मैं पशु आज के मनुष्यों से कई अच्छे है |उन्हें भविष्य की चिंता नहीं होती है वे संग्रह नहीं करते है और संग्रह के लिए दुसरो का गला नहीं घोटते है फिर पशुओ मैं हित अहित सोचने की तो बुद्धि ही नहीं |( Jivan Ka Rahsya )

मनुष्य को भगवान ने बुद्धि दी है फिर भी वह सोचता नहीं की ये मनुष्य जनम हमे किसलिए मिला है

क्या खाने कमाने के लिए ?
भोग भोगने के लिए ?

और अंत मैं असहाय की भाती सब कुछ यही छोड़कर मर जाने के लिए हमे मनुष्य जनम मिला है |
जिस मनुष्य जीवन को शास्त्रों मैं देह दुर्लभ बताया है क्या उनकी सार्थकता भोग भोगने मैं ही है | जो सुख इन्द्र को अमरावती मैं इन्द्राणी के साथ रहने मैं मिलता है वही सुख एक कुत्ते को कुतिया के साथ सहवास मैं प्राप्त होता है |( Jivan Ka Rahsya )

जो स्वाद हमे स्तरस रस भोजन करने से मिलता है वही स्वाद विस्टा खाने वाले सुकरी को विस्टा मैं मिलता है
जिस आराम का बोध हमे मखमल के गद्दे पर पर लेटने पर होता है उसी आराम का बोध एक गधे को पड़ी हुयी राख के ढेर पर लेटने पर होता है ओर फिर पशुओ मैं और हम मैं क्या अंतर रहा ?

हम अपने को पशुओ से श्रेष्ठ क्यों मानते है ?

आज हम से कितने भाई इन प्रश्नों पर विचार करते है हमारा जीवन बोधमय बन गया है हम रात दिन इस शरीर की चिंता मैं ही व्यस्त रहते है हमने शरीर को ही अपनी आत्मा मान रखा है | इस शरीर से परे भी कोई वस्तु है इस बात को जानने की हमे आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती है |( Jivan Ka Rahsya )

मरने के बाद हम कहा जायेंगे ?

इस जीवन के परे भी कोई जीवन है | इस जीवन मैं किये हुए पाप और पुन्य का फल हमे इस जीवन के बाद भी हमे मिल सकता है |( Jivan Ka Rahsya )
इन सब बातो को हम सोचते ही नहीं | इस जीवन मैं हमे सुख से रहे, हमारा मान हो , हमे अधिक भोग प्राप्त हो यही हमारे जीवन का लक्ष्य हो गया |

परन्तु क्या ये लक्ष्य ठीक है ?

आज हम इसी विषय पर कुछ विचार करेंगे

ये जीवन हमें सांसारिक भोग भोगने के लिए नहीं मिला है | भोग सभी अनित्य , अस्थिर , क्षण भंगुर है | जिस प्रकार एक जुगनू की चमक एक क्षण के लिए अपनी छठा दिखा कर तुरंत विलीन हो जाती है उसी प्रकार विसेशु केवल भोगकाल मैं ही सुखदायी प्रतीत होता है | भोग के पूर्व काल मैं हम उनकी कामना से जलते है और परिणाम मैं भी उनका दुखदायी होते है |( Jivan Ka Rahsya )

भोगकाल मैं भी हमे विशेशुग्य की प्रक्रति मात्र होती है | वस्तुत उनमे सुख नहीं है यदि सुख होता तो वह ठहरता उसका विनाश नहीं होता क्युकी सत्य और असत्य की व्याख्या करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने हमे गीता मैं यही बतलाया है की सत्य वास्तु का कभी विनाश नहीं होता और असत्य का भाव नहीं होता( Jivan Ka Rahsya )

“ना शते विध्य्ते भावों , ना भावों विध्य्ते शते “

अत जो सुख अटल है , नित्य है , अविनाशी है वही वास्तव मैं सुख है |जो सुख क्षण स्थायी है एक क्षण मैं उत्पन्न होता है और दुसरे क्षण मैं विनाश हो जाता है वो सुख फिर सुख नहीं मिथ्या सुख है |
सुख की भ्रान्ति है |

( Jivan Ka Rahsya )

Leave a Reply

Your email address will not be published.