ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं

ॐ नमः शिवाय
आज हम बात करणमे जा रहे हे ! ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं के बारे में ! गीता में लिखा हे ! विषय और इन्द्रिय सहयोग से जो सुख प्रथम अमृत के सम्मान सुखकर प्रतीत होते हे !वह परिणाम में विष के सम्मान घातक होजाते हे ! ये सभी सुख राजस सुख हे ! शरीर और इंद्री ही जीवन की मुख्य सम्पति हे !

अब यदि हमारी ऊँगली में यदि जरा सा कटा चूब जाय तो हमारी तमाम जीवन शक्ति विकल होकर उदार ही लग जाती हे ! और इसी प्रकार यदि इन्द्रिय सुख हमे थोड़ा भी प्राप्त होता हे तो हम उसके प्रलोभन को नहीं त्याग सकते यह एक स्वभाविक सी बात हे! और आज लक्षवादी मनुष्य इसी प्रकार अपने जीवन को अपनी इन्द्रिय जनिये वासनाओ पर बलिदान कर रहे हे ! जिनके विषय में उपयुक्त गीता के श्लोक में कहा गया हे की प्रथम वह अमृत के सम्मान मधुर प्रतीत होते हे !

तथा कालांतर में उनका परिणाम विष के सामान घातक हो जाता हे ! (ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं

इश्के उपलक्ष में हम आप को एक कहानी सुनाते हे !

जिससे हम जो चा रहे हे उसका तात्पर्य सिद्ध हो जाय तो बात कुछ ऐसी हे ! एक राजा साहब थे जिनका अभी कुछ ही दुइनौ दिनों पहले राजयभिषेक हुआ ही हे परन्तु वह शराब की इतनी बुरी लत के शिकार थे की वह खुद भी चाहकर इसे नहीं छोड़ सकते जब उनको हमने देखा तो उनकी आयु लग भग 28 वर्ष होगी अतिसय सुन्दर गौरवमई शरीर और अत्यंत रूपवान आकृति परन्तु उनका रंग हल्दी के सम्मान पीला पड़ गया था ! और मुख हलक वह अमाशय तक तमाम आहार नलि घावों से परिपूर्ण हो गयी थी !उनकी हालत इतनी बुरी हो गयी थी की दूध के आलावा कोई भी खाद्य पदार्थ उनके सरीर में जाने से अब असमर्थ हो गया था !

और अब तो वह खराब हालत और बाद क्र इतना ज्यादा हो गयी थी की पिछले 8 महीना से बिना एनिमा दिए उन्हें दस्त भी नहीं आती थी !और लग भग 5 महीनो से उनको अब नींद भी ठीक से नहीं आ रही थी हर एक क्षण उनको ऐसा लगता था की अभी ही उठ के कही घूम आउ लेकिन उनका यह सोचना व्यर्थ था क्यों की अब ऐसा नहीं होने वाला था !उनका पेशाब शहद के सम्मान हो गया था जिसकी वजह से भी उनको बहुत ज्यादा तकलीफ होने लगी ! और अब तो ऐसी स्थिति आ गयी थी की वह एक क्षण भी स्थिर नहीं लेट सकते थे !

और जब उनका कुछ भी करना असमर्थ हो गया तो उन्होंने अब एक ही बात कही की देखिये में शराब जीते जी नहीं छोड़ सकूंगा यह सब आप अछि तरह से सुनले ! फलस्वरूप वह मधुर भाग्यहीन राजा अपनी अल्पायु में की काल का ग्रास हो गया अर्थात उनकी मृत्यु हो गयी ! (ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं)

अगर और पता किया जाय तो इसी प्रकार का एक उदाहरण और भी हे! एक करोड़पति सेठ का एकमात्र ही बेटा था जिसका मतलब साफ़ था उनका एक मात्र ही उत्तराधिकारी अब बचा था !लेकिन अब उसे भी शराब पिने की लत लग गयी थी इसका हल भी अब वैसा ही होने लगा था जैसा हाल उस राजा का होने लगा था !

उसकी चमड़ी पूरी सुख कर काली पद गयी थी उसको देखने से ऐसा लगता था जैसे किसी डरावने भूत को देख लिया हो ! अचानक बैठे बैठे ही वह जोर से डर जाता था उसको ऐसा लगता था जैसे उसको कोई डराने आया हे या अपने साथ लेजाने आया था! अचानक जोर से डर कर वह अपने कपड़ो में ही मॉल मूत्र त्याग देता था ! और अब तो स्तिथि ऐसी आ गयी थी की वह दिन में बार बार अचानक मूर्छित होकर गिर पड़ता था ! वह अतिसय कास्ट भोग कर शराब पीते पीते ही मर गया ! (ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं)

यह तो कुछ उदाहरण ही थे जो हमने आप को बताय लेकिन बहुत से आदमियों को हम देखते हे या फिर सुनते हे की वह खाने पिने का बहुत ही ज्यादा शौकीन हे ! वह बिना जाने अनजाने में इस अजीब शोक से इतने बंध जाते हे की उनको पता ही नहीं लग पता की हम आखिर कर क्या रहे हे ! देखिये हम एक बार ऐसा समज लेते हे की ये सोख खराब नहीं हे ! लेकिन इस सोख के चलते अजीब अजीब चीजे हम अपनी ज़िंदगी में उतरने लगते हे और वही चीजे आगे जाकर हमे हमारे पतन की और लेजाती हे ! (ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं)

अब ऐसे ही किसी रोम के बादशाह को बाबत हमने पढ़ा था की वह भी जनाब खाने के बहुत बड़े सोखिन थे !

और आप मानोगे नहीं की वह खाने का इतना बड़ा सोखिन था की इस सम्पूर्ण जगत में ऐसी कोई चीज नहीं बची होगी खाने में जो की उसने नहीं खाई हो ! उसके बाद होना ही क्या था आप और हम जानते ही हे ! जब उसको खाने में वही पुरानि पहले खा चुकी चीजों का ही स्वाद मिलने लगा तो उससे खाना कुछ ज्यादा रास नहीं आने लगा और वह कुछ चीड़ चिड़ा सा रहने लगा ! उसने मांस मदिरा शाकाहारी हर एक चीज को अपनी पसंद बनाली और अब जब उनसे वह ऊबने लगा उसको खाने में कुछ नया नहीं मिलने लगा तो उसने बड़े बड़े रसोइयों को अपने महल में रखना चालू कर दिया !

ज्यो की उसके लिए हमेसा कुछ न कुछ नया बनाकर ही पेश करते थे ! लेकिन यह सिलसिला भी कब तक चल जाता फिर कुछ दिनों बाद व्ही समस्या सामने आने लगी की उनको खाने में फिरसे कुछ नया नहीं मिल रहा हे ! उसके पश्चास्त उन बादशाह ने आत्मघात कर खुद ही अपना जीवन समाप्त कर लिया १ अब जरा सोचिये आप इससे बड़ी और क्या दुर्दशा होगी की हमे हमारे ही कारन खुद का नाश करना पड़ जाय ! हज हमारे आस पास देखते भी ज्ञानी लोग यह कहते हे की अमुख चीजे जईो खाने के लायक नहीं हे !

उन्हें मत खान लेकिन मनुष्य फिर भी उनको अपने भोजन का एक हिस्सा बना लेता हे और खुद ही अपना नाश कर देता हे अब इससे दयनीय और क्या हो सकता हे हम मनुस्यो के लिए (ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं)

हमारे जीवन में जीवन यापन करने क लिए मस्तिष्क ह्रदय यह दो जीवन यंत्र हे ! और हम इन्ही के द्वारा सरीर का संचालन कर पाते हे !इन यंत्रो हमारी सल्गन जो जीवन शैली हे उसको इन्द्रियों से जीवन केंद्र को एक साथ संबधित करती हे ! और इस प्रकार ही जीवन केंद्र उनके उस स्वाद को ग्रहण करता हे ! देखिये सीधा मतलब यह हे की जैसे हमारे सरीर के अंग हे ! उनमे से कान सुनने को अशक्त होते हे ! आँखे उस चीज को देखने की अशक्त होती हे जो चीज हमे सुन्दर लगे ! हमारी जिव्हा उस चीज का स्वाद चखने को अशक्त होती हे जो चीज हमको स्वादिस्ट लगती हे ! देखिये तो अब इन चीजो को हमे रोकना कैसे हे ! अब आप सोचेंगे की आखिर इन्हे रोकना क्यों हे !

क्या हम वह नहीं देख सकते जो हमको सुन्दर लगे क्या इतना मात्र देखने से ही हमको कालांतर में कोई मुसीबत होगी तो जी हां ! आप एक दम गलत सोच रहे हे ! हमको वही देखना चाइये जिसको वास्तम में देखा जाना चाहिए ! अगर कोई चीज देखने योग्य भी हो और सुन्दर भी हो लेकिन उसको देखा जाना गलत हो बस हमको सुन्दर लग रही ह तो हम देख रहे हे ! ऐसा हो तो वह गलत हे ! (ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं)

अब जरा सोच लीजिये आप को कोई चीज पसंद हो वह सुन्दर हो ! तो आप उससे देख रहे हे ! लेकिन अगर वह चीज आओ के सामने फिर कभी आई ही नहीं जिससे की आपको बहुत सुकून मिल रहा था तो फिर आप क्या करोगे ! सिर्फ चिंता दुखी होना वगेरा वगेरा जैसा की आजकल हर कोई करता हे ! तो फिर आप तो आप रहे ही नहीं आप के मुख्य दो यंत्र दिमाग और मन तो उस चीज के गुलाम होकर उसमे ही बंधे पड़े हे ! और यह तो बिलकुल गलत हे !

और इसे गलत हम नहीं कहते आप खुद भी कहोगे जरा सोचिये वो चीज जो सुन्दर हे और अब वो नहीं हे ! बस क्या वह चीज अब हमको चलाने लगेगी ! तो फिर में कौन हु मुझे तो बस कोई चीज नियंत्रित कर रही हे ! तो अब सोचिये आप की आप को आप के दिमाग को कोई चीज कंट्रोल करेगी तो गलत ही हुआ यह तो !

हमारी इन्द्रिया हमारे कंट्रोल में ही रहनी चाहिए किसी और की नहीं ! बुरी चीजे ही हमे जल्दी अपनी और आकर्षित कर लेती हे ! लेकिन अच्छाई की तरफ हमको आकर्षित होना पड़ता हे ! लेकिन अच्छाई और बुराई को पहचानना बहुत ही आसान होता हे ! अगर आप कोशिस करे तो ! (ब्रह्मचर्य की कठिनाइया और विघ्नं)

Deep_Stranger

“Admin Of Brahmrishi Website”