कुण्डलिनी जागरण 4 योग चतुष्ट्य के सिदान्त

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योग तत्व के ज्ञाता महर्षियों ने योग साधन की चार शेलिया बतलाई है ये है – मन्त्रयोग , हठयोग , लययोग व राजयोग | इसी तरह योग के 8 सोपान भी बतलाये है | ये है – यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान व समाधि |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

योग साधन की पहली शेली मंत्र योग है | इसका सिद्धांत है की यह सृष्टी नाम व रूप वाली है | नाम व रूप के कारण ही जीव अज्ञानता से जकड़ा है | जीव नाम व रूप से संसार में या अविद्या में जकड़ा जाता है तो वह नाम व रूप से ही मुक्ति भी पा सकता है |

इस योग में जो ध्यान किया जाता है वह स्थूल ध्यान कहलाता है | इसमें ध्यान परमात्मा की सगुणोपासना द्वारा किया जाता है , जिसमे मंत्र जप , स्थान की शुचिता , स्तवन , दिशाशुद्धि आदि विधिया अपनाई जाती है | मंत्र योग के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली समाधि महाभाव समाधि कहलाती है |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

मन्त्रयोग के प्रमुख आचार्यो में देवर्षि नारद , गर्ग , पुलस्त्य, बृहस्पति, भृगु , वाल्मीकि , आदि सम्मिलित है | इन आचार्यो ने नाम व रूप के माध्यम से जो साधनाए बतलाई है वही मन्त्रयोग कहलाता है | इसकी महिमा सर्वाधिक है | मूर्ति पूजा इसी योग का अंग है |

मंत्र योग के 16 अंग है – भक्ति , शुद्धि , आसन , पंचांग सेवन , आचार धारणा , दिव्य्देश सेवन , प्राणक्रिया , मुद्रा , तर्पण , हवन , बलि , याग , जप , ध्यान व समाधि |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

इस योग के अंग भक्ति का भक्ति शास्त्रों में वर्णन विस्तार से वर्णित है | शुद्धि के अंतर्गत दिशा , स्थान की शुद्धि , स्नान से शरीर शुद्धि , प्रणायाम से मन की शुद्धि आदि का वर्णन है | आसन के अंतर्गत कैसा आसन ग्रहण करना चाहिए | जैसे मुर्गचार्मासन , कुशासन आदि | पंचांग सेवन में इष्टदेव की गीता , सहस्त्रनाम , स्तोत्र , कवच , ह्रदय आदि है |

आचार के अनेक प्रयोग तन्त्र व पुराणों में वर्णित है | धारणा के अंतर्गत मन को शरीर के भीतर स्थान विशेष में स्थिर करना व प्रतिभा के अंगो पर मन लगाना है | दिव्य देश के अंतर्गत सोलह स्थानों में पीठ पूजा करना शामिल है | जैसे ह्रदय , नाभि आदि | प्राणायामो के अतिरिक्त शरीर के विभिन्न स्थानों में प्राणों को ले जाकर साधना करना प्राण क्रिया है | इष्टदेव की प्रसन्नतार्थ की जाने वाली चेष्टाये मुद्रा है | ( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

जैसे योनी मुद्रा , शंख मुद्रा अश्विनी मुद्रा , प्लाविनी मुद्रा आदि | विशिष्ट पदार्थो से इष्टदेव का तर्पण करना तर्पण है | अग्नि में आहुति देना हवन है | बलि के अंतर्गत आत्मबली , इन्द्रिय बलि है | योग दो प्रकार के होते है – अंतर्योग और बहिर्योग | इष्टदेव के नाम का उच्चारण जप है |

यह तीन प्रकार का वाचिक , उपांशु , मानसिक होता है |इष्टदेव के स्वरूप का ध्यान करना ध्यान कहलाता है | ध्यान करते करते ध्यान में लीन हो जाना ही मंत्र योग में महाभाव समाधी कहलाती है |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

हठयोग योग साधना की दूसरी शेली है | इसके प्रमुख आचार्य भरद्वाज , जेमिनी , पराशर , विश्वामित्र , भृगु , मार्कण्डेय आदि है | इस योग का सिद्धांत है की स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर के संस्कार वश ही बनता है |

अत स्थूल शरीर के द्वारा सूक्ष्म शरीर पर आधिपत्य क्यों नहीं किया जा सकता ? फलस्वरूप हठयोग का साधक स्थूल शरीर से योग क्रियाये करता हुआ सूक्ष्म शरीर पर भी हठपूर्वक आधिपत्य स्थापित करके तथा चितवर्ती का निरोध करता हुआ अपने लक्ष्य परमात्मा को पा लेता है | योग की इसी प्रणाली को हठयोग कहा गया है |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

हठयोग में इष्ट के रूप में ज्योति का ध्यान किया जाता है | इस योग में बाहरी इन्द्रियों पर प्रभुत्व रखने के लिए यम का प्रावधान है तो अंदर की इन्द्रियों को वश में करने के लिए नियम का प्रावधान है | शरीर को योग साधन के योग्य बनाने के लिए आसन की व्यवस्था की गयी है |

इसी तरह प्राण अपान वायु पर प्रभाव डालकर योग साधना के लिए उपयोगी बनाने हेतु प्राणायाम की व्यवस्था है , मन को अन्तर्मुखी करने के लिए प्रत्याहार की व मन को भीतर सिथिर रखने के लिए धारणा की व्यवस्था है | ध्यान ज्योति का किया जाता है | यही हठयोग में अष्टांग कहलाता है |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

हठयोग में वायु को रोककर मन को वशीभूत कर समाधिस्थ होने की व्यवस्था है | इस समाधी को महाबोध समाधी कहते है | हाथ योग के 7 अंग है – षट्कर्म , आसन , मुद्रा , प्रत्याहार , प्राणायाम , ध्यान व समाधि |

षट्कर्म से शरीर शोधन , आसन से दृढ़ता , मुद्रा से सिथिरता , प्रत्याहार से धीरता , प्राणायाम से लाघव , ध्यान से आत्मदर्शन का लाभ व समाधि से मुक्ति होती है | धोती , वस्ती , नेति , लोलिकी , त्राटक व कपालभाती आदि षट्कर्म कहलाते है |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

लययोग का सिद्धांत है की मानव शरीर ब्रह्मांड का ही प्रतिरूप है | जिस प्रकार ब्रह्मांड में ग्रह नक्षत्र , भुवन आदि है उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में आधार कमल में कुण्डलिनी नामक ब्रह्मशक्ति प्र्सुप्ताव्स्था में रहती है और अविद्या के प्रभाव से सृष्टी रचती है |

मनुष्य देह में सातवे चक्र मस्तक में स्तिथ सहस्त्र दल में कुण्डलिनी को ले जाकर ब्रह्म रूप शिव से मिला दिया जाता है | और मुक्ति प्राप्त की जाती है | इस साधन क्रिया को ही लययोग कहते है |

लययोग के 9 अंग है – यम , नियम , स्थूल क्रिया , सूक्ष्म क्रिया , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान , लय क्रिया व समाधि |   स्थूल शरीर प्रधान क्रिया को स्थूल क्रिया , वायु प्रधान क्रिया को सूक्ष्म क्रिया , बिन्दुमय प्रक्रति – पुरुषात्मक ध्यान को बिंदु ध्यान कहते है |

लययोग के अनुकूल अतिसूक्ष्म सर्वोतम क्रिया जो जीवन्मुक्त योगियों के उपदेश के फलस्वरूप प्राप्त होती है , वह लय क्रिया कहलाती है | लय क्रिया की सिद्धी से महालय रूप समाधि की लब्धि होती है | लययोग का साधक योग द्वारा अंतर्जगत में अलोकिक बिंदु का दर्शन करता है | उसी को बिंदु ध्यान कहते है |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

राजयोग तीनो योगो का चरम बिंदु है | इसीलिए इसे योगसाधनाओ का राजा कहा जाता है | राजयोग के लक्षणों व उसके साधन क्रम के विषय में शास्त्रों में कहा गया है की सृष्टी , स्तिथि व लय का मूल कारण अन्तकरण है |

अन्तकरण के द्वारा जो साधन किया जाता है उसी को राजयोग कहते है | अन्तकरण के चार भेद है – मन , बुद्धि , चित और अहंकार | इस योग में विचारबुद्धि की प्रमुखता रहती है |

राजयोग का साधक जो ध्यान करता है उसे ब्रह्मध्यान कहते है तथा इस योग की समाधी को निर्विकल्प समाधी कहते है जिसे राजयोग की सिद्धी प्राप्त हो जाती है वह जीवन्मुक्त कहलाता है | राजयोग सभी योग साधनों में श्रेष्ठ है | इसीलिए इसे राजयोग कहा जाता है |( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

राजयोग के 16 अंग है – सात अंग ज्ञान भूमिकाओ के अनुसार है जो सभी विचार प्रधान है , दो अंग धारणा के है ( प्रक्रति और ब्रह्म धारणा ) , तीन ध्यान के अंग है ( विरत , इश , ब्रह्म ध्यान ) चार समाधि के अंग है ( दो सविचार और दो निर्विकार )

( योग चतुष्ट्य के सिदान्त )

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