रथ यात्रा – क्यों मनाते है आखिर रथ यात्रा

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रथ यात्रा क्यों मनाया जाता है, इसे प्रायः लोग जानते हैं। परन्तु आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को रथ यात्रा मनाए जाने के पीछे बहुत पुरानी कथा है। शास्त्रों के अनुसार रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होती है। (रथ यात्रा)

इस महीने रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि यानि 23 june 2020 को मनाया जाएगा। रथ यात्रा मनाए जाने के पीछे सदियों पुराना इतिहास है। कहते हैं कि राजा इन्द्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे। (रथ यात्रा)

रथ यात्रा क्यों मनायी जाती है ? और कोनसे दिन मनायी जाती है ?

रथ यात्रा के विषय में शायद काफी लोगो को पता भी हो लेकिन ऐसे बहुत ही कम लोग है जिन्हें ये पता हो की आखिर रथ यात्रा क्यों मनायी जाती है ? रथ यात्रा भारत में मनाया जाने वाला बहुत ही प्रसिद्ध पर्व है बाकी पर्वो और रथ यात्रा म बहुत फर्क है

क्युकी रथ यात्रा घरो अतवा मन्दिरों में पूजा पाठ या व्रत करके मनाया जाने वाला पर्व नहीं है इस पर्व को इक्कठे होकर मनाया जाता है इस पर्व में रथ यात्रा निकली जाती है इस पर्व को देश में दो शहरो में रथ यात्राये निकाली जाती है | (रथ यात्रा)

भारत देश के उड़ीसा राज्य के तटवर्ती शहर जगन्नाथपुरी में भगवान का भव्य मंदिर है इस शहर को मुख्यतः पूरी के नाम से जाना जाता है पूरी में हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की विशाल रथ यात्रा निकली जाती है पूरी के जगन्नाथ मन्दिर को भारत के 4 धाम में से एक माना गया है | अहमदाबाद में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकली जाती है , लेकिन पूरी की रथ यात्रा ज्यादा प्रसिद्ध है| (रथ यात्रा)

आखिर में क्या है रथ यात्रा ?

रथ यात्रा एक पर्व है जिसे मुख्यतः हिन्दू धर्मावलम्बियो के द्वारा हर वर्ष एक बार मनाया जाता है यह पर्व बाकी हिन्दू पर्वो से अलग माना जाता है क्युकी बाकी हिन्दू पर्व मुख्यत अपने घरो अतवा मंदिरों में पूजन पाठन या व्रत रखकर मनाये जाते है लेकिन यह पर्व उन सबसे अलग है क्युकी इस पर्व को सभी लोग इक्कठे होकर मनाते है इस पर्व को पूरी शहर में रथ यात्रा निकलकर मनाया जाता है | इस पर्व को 10 दिनों तक मनाया है |

पूरी शहर भारत के उड़ीसा राज्य में स्तिथ है जिसे शंख क्षेत्र , श्री क्षेत्र , पुरुषोतम पूरी इत्यादि नामो से भी जाना जाता है इस शहर के लोग प्रमुख देवता भगवान जगन्नाथ को ही मानते है और पूरी को भगवान जगन्नाथ जी की मुख्य लीला भूमि माना जाता है यह का मुख्य पर्व भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा है रथ यात्रा पर्व बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है रथ यात्रा दर्शन लाभ के लिए देश विदेश से लाखो भक्त आते है |

रथ यात्रा कब मनाया जाता है ?

रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि यानि 23 june 2020 को मनाया जाएगा। यह यात्रा 10 दिन की होती है | मान्यता है की भगवान जगन्नाथ आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया से दशमी तक लोगो के बीच रहते है रथ यात्रा का उत्सव सेकड़ो वर्षो से लगातार मनाया जाने वाला पर्व है | हर वर्ष रथ यात्रा में शामिल होने के लिए लाखो श्रदालुओ की संख्या साल दर साल बढती जा रही है |

भगवान जगन्नाथ जी को भगवान श्री कृष्ण और राधा की युगल मूर्ति का रूप माना जाता है रथ यात्रा की तयारी हर वर्ष बसंत पंचमी से ही शुरू कर दी जाती है भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के लिए नीम के चुनिंदा पेड़ की लकडियो से रथ तेयार किया जाता है | रथ की लकड़ी के लिए अच्छे और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है जिसमे किल आदि न ठुके और रथ के निर्माण में किसी प्रकार की धातु का उपयोग नहीं किया जाता है | (रथ यात्रा)

रथ यात्रा क्यों मनायी जाती है ?

भगवद भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और उत्सव मनाते हैं। पुरी में जिस रथ पर भगवान की सवारी चलती है वह विशाल एवं अद्वितीय है। वह 45 फुट ऊंचा, 35 फुट लंबा तथा इतना ही चौड़ाई वाला होता है। इसमें सात फुट व्यास के 16 पहिये होते हैं।

इसी तरह बालभद्र जी का रथ 44 फुट ऊंचा, 12 पहियों वाला तथा सुभद्रा जी का रथ 43 फुट ऊंचा होता है। इनके रथ में भी 12 पहिये होते हैं। प्रतिवर्ष नए रथों का निर्माण किया जाता है। भगवान मंदिर के सिंहद्वार पर बैठकर जनकपुरी की ओर रथयात्रा करते हैं।

जनकपुरी में तीन दिन का विश्राम होता है जहां उनकी भेंट श्री लक्ष्मीजी से होती है। इसके बाद भगवान पुनः श्री जगन्नाथ पुरी लौटकर आसनरुढ़ हो जाते हैं। दस दिवसीय यह रथयात्रा भारत में मनाए जाने वाले धार्मिक उत्सवों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

भगवान श्रीकृष्ण के अवतार ‘जगन्नाथ’ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। जगन्नाथ जी का रथ ‘गरुड़ध्वज’ या ‘कपिलध्वज’ कहलाता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे ‘त्रैलोक्यमोहिनी’ या ‘नंदीघोष’ रथ कहते हैं। बलराम जी का रथ ‘तलध्वज’ के नाम से पहचाना जाता है।

रथ के ध्वज को ‘उनानी’ कहते हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है वह ‘वासुकी’ कहलाता है। सुभद्रा का रथ ‘पद्मध्वज’ कहलाता है। रथ ध्वज ‘नदंबिक’ कहलाता है। इसे खींचने वाली रस्सी को ‘स्वर्णचूडा’ कहते हैं।रथयात्रा आरंभ होने से पहले पुराने राजाओं के वंशज पारंपरिक ढंग से सोने के हत्थे वाली झाडू से ठाकुर जी के प्रस्थान मार्ग को साफ करते हैं।

इसके बाद मंत्रोच्चार एवं जयघोष के साथ रथयात्रा शुरू होती है। सर्वप्रथम बलभद्र का रथ तालध्वज प्रस्थान करता है। थोड़ी देर बाद सुभद्रा की यात्रा शुरू होती है। अंत में लोग जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक खींचते हैं। लोग मानते हैं कि रथयात्रा में सहयोग से मोक्ष मिलता है, अत: सभी श्रद्धालु कुछ पल के लिए रथ खींचने को आतुर रहते हैं। (रथ यात्रा)

जगन्नाथ जी की यह रथयात्रा गुंडीचा मंदिर पहुंचकर संपन्न होती है। ‘गुंडीचा मंदिर’ वहीं पर स्थित है जहां विश्वकर्मा जी ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। यह भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। यहां भगवान एक सप्ताह प्रवास करते हैं और इस दौरान यहीं पर उनकी पूजा की जाती है।

आषाढ़ शुक्ल दशमी को जगन्नाथ जी की वापसी यात्रा शुरू होती है। शाम तक रथ जगन्नाथ मंदिर पहुंच जाते हैं लेकिन प्रतिमाओं को अगले दिन ही मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के गर्भगृह में फिर से स्थापित किया

यात्रा में शामिल होने वाले को मिलता हैं यज्ञ बराबर पुण्य-

भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का अवतार माना गया हैं। जिनकी महिमा का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों एवं पुराणों में भी किया गया हैं। ऐसी मान्यता हैं कि जगन्नाथ रथयात्रा में भगवान श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ होता हैं।

जो इस रथयात्रा में शामिल होकर रथ को खींचते हैं उन्हें सौ यज्ञ के बराबर पुण्य लाभ मिलता हैं। रथयात्रा के दौरान लाखों की संख्या में लोग शामिल होते हैं एवं रथ को खींचने के लिए श्रद्धालुओं का भारी तांता लगता हैं। जगन्नाथ यात्रा हिन्दू पंचाग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती हैं (रथ यात्रा)

जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व-

हिन्दू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा का एक बहुत बड़ा महत्व हैं। मान्यताओं के अनुसार रथ यात्रा को निकालकर भगवान जगन्नाथ को प्रसिद्ध गुंडिचा माता मंदिर पहुँचाया जाता हैं। यहाँ भगवान जगन्नाथ आराम करते हैं। गुंडिचा माता मंदिर में भारी तैयारी की जाती हैं एवं मंदिर की सफाई के लिये इंद्रद्युमन सरोवर से जल लाया जाता हैं।

यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यही है कि यह पूरे भारत में एक पर्व की तरह मनाया जाता हैं। चार धाम में से एक धाम जगन्नाथ मंदिर को माना गया हैं। इसलिए जीवन में एक बार इस यात्रा में शामिल होने का शास्त्रों में भी उल्लेख हैं।

जगन्नाथ रथयात्रा में सबसे आगे भगवान बालभद्र का रथ रहता हैं बिच में भगवान की बहन सुभद्रा का एवं अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ रहता हैं। इस यात्रा में जो भी सच्चे भाव से शामिल होता हैं उसकी मनोकामना पूर्ण होकर उसे मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।

जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास-

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा देश में एक पर्व की तरह मनाई जाती हैं इसलिए पूरी के अलावा कई जगह यह यात्रा निकाली जाती हैं। रथयात्रा को लेकर कई तरह की मान्यताएं एवं इतिहास हैं। बताया जाता हैं कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की चाह रखते हुए भगवान से द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन को रथ में बैठाकर नगर का भ्रमण करवाया। (रथ यात्रा)

जिसके बाद से यहाँ हर वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती हैं। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा की प्रतिमायें रखी जाती हैं और उन्हें नगर का भ्रमण करवाया जाता हैं। यात्रा के तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं जिन्हें श्रद्धालु खींचकर चलते हैं।

भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए लगे होते हैं एवं भाई बलराम के रथ में 14 व बहन सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं। यात्रा का वर्णन स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, बह्म पुराण आदि में मिलता हैं। इसीलिए यह यात्रा हिन्दू धर्म में काफी खास हैं।

रथ यात्रा

2 thoughts on “रथ यात्रा – क्यों मनाते है आखिर रथ यात्रा

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