कुण्डलिनी जागरण -3 शरीरस्थ पंचकोश

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मनुष्य का शरीर पांच कोशो वाला है | ये पांच कोश है – अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश , विज्ञानमय कोश तथा आनंदमय कोश | इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नानुसार है – ( शरीरस्थ पंचकोश )

अन्नमय कोश –

पञ्च तत्वों ( जल , वायु , आकाश , पृथ्वी , अग्नि ) से निर्मित स्थूल शरीर का पहला कोश अन्नमय है | इस कोश का पोषण अन्न से होता है | ( शरीरस्थ पंचकोश )

शरीरस्थ पंचकोश

इसका अन्न भोजन , जल , वायु है | शुद्धाहार , आसनसिद्धी , प्राणायाम से इस कोश की शुद्धि होती है | इस कोश को भोजन , वायु व जल से ही ऊर्जा प्राप्त होती है |

प्राणमय कोश –

यह शरीर का दूसरा कोश है | इसमें स्पंदन की गति का कारण प्राणशक्ति है | प्राणशक्ति या आत्मिक उर्जा के कारण ही जड़ शरीर में चेतन्यता है | प्राणायाम से इस प्राणमय कोश की कार्य क्षमता वृद्धि को प्राप्त होती है |

मनोमय कोश –

शरीर द्वारा की जाने वाली समस्त गतिविधिया इसी कोश द्वारा संपादित होती है | मन इसमें प्रमुख है | वही नयी नयी योजनाये बनाता रहता है |( शरीरस्थ पंचकोश )

मन के अतिरिक्त इसमें बुद्धि , अहंकार , चित भी सम्मिलित है | इन चारो के कारण अंत करण बनता है , मनोमय कोश इन्द्रियों के माध्यम से शरीर द्वारा कार्य करवाता है |

विज्ञानमय कोश –

यह कोश बुद्धि या ज्ञान प्रधान होने के कारण ही विज्ञानमय कहलाता है | अहंकारवश यह स्वयं को स्वतंत्र मानकर कर्ता भोक्ता बनता है |

मनोमय कोश में जो भी संकल्प विकल्प उत्पन्न होते है , उनका निर्णायक यही विज्ञानमय कोश है | यह जो भी निर्णय करता है उसे मन को मानना पड़ता है |( शरीरस्थ पंचकोश )

आनंदमय कोश –

यह शरीर का पाचवा कोश है | इसी को ह्रदयाकाश , चिदाकाश , ह्र्दयगुहा , लिंग शरीर , कारण शरीर आदि नामो से जाना जाता है |

यह अंतर्जगत से संबंध है तथा चिर आनंद की अनुभूति इसी को होती है | इस आनंदमय कोश का अनुभव सुषुप्ति में होता है |

जीव जीवन्मुक्त होकर इस आनंदमय कोश में रहता है | इस प्रकार प्राण के द्वारा ही शरीर सक्रिय रहता है | प्राण शक्ति की सहायक आत्मा है |

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