शिव के अस्त्रों का निर्माण

Posted on

आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि ‘कल्पना’ ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया। भगवान शिव दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं। ( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है।  आज से 15 से 20 हजार वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे थे, तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी। ( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

इस दौरान भगवान शंकर ने धरती के केंद्र कैलाश को अपना निवास स्थान बनाया। विष्णु ने समुद्र को और ब्रह्मा ने नदी के किनारे को अपना स्थान बनाया था। पुराण कहते हैं कि जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है, जो भगवान विष्णु का स्थान है।

शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था। इन तीनों से सब कुछ हो गया।( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ और इस तरह धीरे-धीरे जीवन भी फैलता गया।

सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदि देव भी कहा जाता है। आदि का अर्थ प्रारंभ। शिव को ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। इस ‘आदिश’ शब्द से ही ‘आदेश‘ शब्द बना है। नाथ साधु जब एक–दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश।( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

शिव के अलावा ब्रह्मा और विष्णु ने संपूर्ण धरती पर जीवन की उत्पत्ति और पालन का कार्य किया। सभी ने मिलकर धरती को रहने लायक बनाया और यहां देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष और मनुष्य की आबादी को बढ़ाया।( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

महाभारत काल :

शिव के अस्त्रों का निर्माण

ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल तक देवता धरती पर रहते थे। महाभारत के बाद सभी अपने-अपने धाम चले गए। कलयुग के प्रारंभ होने के बाद देवता बस विग्रह रूप में ही रह गए अत: उनके विग्रहों की पूजा की जाती है।

पहले शिव थे रुद्र :

वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं। वराह काल के पूर्व के कालों में भी शिव थे। उन कालों की शिव की गाथा अलग है।( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

देवों के देव महादेव :

देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं।( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

हिन्दू धर्म के अनुसार सतयुग में इस तरह के विशालकाय मानव हुआ करते थे। बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। पुराणों के अनुसार भारत में दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करती थी।

शिव का चक्र :

चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। उन सभी के अलग-अलग नाम थे। शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

शिव के अस्त्रों का निर्माण

यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।

त्रिशूल :

इस तरह भगवान शिव के पास कई अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र देवताओं को सौंप दिए। उनके पास सिर्फ एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें 3 तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन। इसके अलावा पाशुपतास्त्र भी शिव का अस्त्र है।( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

शिव धनुष : पिनाक

पिनाक का निर्माण स्वयं शिव जी ने ही किया था. इस धनुष के ध्वनि मात्र से ही पर्वत हिल जाते थे और बादल फटने लगते थे और पृथ्वी पर भूकंप जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती थी. पुराणों में  उल्लेखनीय है कि जब राजा दक्ष ने यज्ञ में भगवान शिव का भाग नहीं निकाला तो क्रोध में शिवजी ने सभी देवताओं का विनाश करने का निर्णय किया।

तब बहुत मुश्किल से शिव का क्रोध शांत कर पिनाक धनुष देवताओ को दिया गया और अंतः देवताओं ने ये धनुष राजा जनक के पूर्वज देवरात को दे दिया। राजा जनक ने इसको शिव की धरोहर समझ कर सुरक्षित रूप से रख लिया। ऐसा कहा जाता है कि इस धनुष को उठाने की क्षमता हर किसी में नहीं थी परन्तु भगवान राम ने इसको एक झटके में तोड़ दिया था.( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

भवरेंद्रु चक्र

यह बहुत ही शक्तिशाली चक्र था

पाशुपताशास्त्र

शिव जी का सबसे खास , प्रिय और सबसे विध्वंशक अस्त्र है ये पाशुपताशास्त्र। इसके प्रभाव से बचना बहुत ही कठिन था. यह सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश करने में सक्षम था. इस अस्त्र को पशुपतिनाथ ने ब्रह्माण्ड की रचना से पूर्व तपस्या कर आदि शक्ति से प्राप्त किया था. चूकि इस अस्त्र से पूरी सृष्टि का अंत किया जा सकता था इसलिए अर्जुन ने इसका इस्तेमाल नहीं किया था.

शिव के अस्त्रों का निर्माण

पाशुपताशास्त्र को केवल भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र ही प्रभावहीन कर सकता था यह अस्त्र चारों दिशाओं से विजय दिला सकता था. इसे आँख , शब्द , धनुष  और मन से छोड़ा जा सकता था. ऐसा कहा जाता है कि शिव इसी अस्त्र से सृष्टि का विनाश करेंगे।

पुराणों के उल्लेख से ज्ञात होता है कि जब पाशुपताशास्त्र को चलाया जाता था तो इसके बाद सब कुछ नष्ट हो जाता था. इसका  प्रयोग होने से नकारात्मक शक्तियां जैसे दैत्य , शैतान आत्माएं आदि आ जाते थे और इसे ओर भी शक्तिशाली बना देते थे. पाशुपताशास्त्र का एक स्रोत भी है जिसके कारण जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त की जा सकती हैं. ( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

इसका जप करने से मनुष्य जीवन की सब विध्नों से विजय प्राप्त की जा सकती हैं. पाशुपताशास्त्र के सामने जीवित या मृत सबकुछ नष्ट हो जाता था परन्तु इतना शक्तिशाली होने के बावजूद पुरातन काल का सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र पाशुपताशास्त्र नहीं हैं. ब्रह्मा द्धारा निर्मित ब्रह्मदण्ड और भगवान विष्णु द्धारा निर्मित नारायणशास्त पाशुपताशास्त्र से कही ज्यादा शक्तिशाली और विनाशकारी हैं.

( शिव के अस्त्रों का निर्माण )

You May Like Also 😉

मंत्र का 108 बार जाप क्यों किया जाता है ?

महा मृत्युंजय मंत्र के चमत्कार

2 thoughts on “शिव के अस्त्रों का निर्माण

Leave a Reply

Your email address will not be published.