श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश

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शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा था । श्रमणा भील समुदाय की “शबरी ” जाति से सम्बंधित थी । संभवतः इसी कारण श्रमणा को शबरी नाम दिया गया था । पौराणिक संदर्भों के अनुसार श्रमणा एक कुलीन ह्रदय की प्रभु राम की एक अनन्य भक्त थी लेकिन उसका विवाह एक दुराचारी और अत्याचारी व्यक्ति से हुआ था । ( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

प्रारम्भ में श्रमणा ने अपने पति के आचार-विचार बदलने की बहुत चेष्टा की , लेकिन उसके पति के पशु संस्कार इतने प्रबल थे की श्रमणा को उसमें सफलता नहीं मिली । ( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

कालांतर में अपने पति के कुसंस्कारों और अत्याचारों से तंग आकर श्रमणा ने ऋषि मातंग के आश्रम में शरण ली । आश्रम में श्रमणा श्रीराम का भजन और ऋषियों की सेवा-सुश्रुषा करती हुई अपना समय व्यतीत करने लगी । शबरी को भक्ति – साहित्य में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । कुछ भक्तों ने यहां तक कह दिया की प्रभु राम ने शबरी के झूठे फल खाए थे ।( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

महर्षि वाल्मिकी कृत रामायण के अनुसार स्थूलशिरा नामक महर्षि के अभिशाप से राक्षस बने कबन्ध को श्रीराम ने उसका वध करके मुक्ति दी और उससे सीता की खोज में मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। तब कबन्ध ने श्रीराम को मतंग ऋषि के आश्रम का रास्ता बताया और राक्षस योनि से मुक्त होकर गन्धर्व रूप में परमधाम पधार गया।श्रीराम व लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे।( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

वहां आश्रम में वृद्धा शबरी भक्ति में लीन थी। मतंग ऋषि अपने तप व योग के बल पर अन्य ऋषियों सहित दिव्यलोक पहुंच चुके थे। ऋषि मतंग ने शबरी से एक अपेक्षित घड़ी में कह दिया कि राम तुम्हारी कुटिया में आएंगे। ऋषि ने शबरी की श्रद्धा और सबूरी की परख करके यह भविष्य वाक्य कहा। शबरी एक भरोसे लेकर जीती रही। ( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

वह बूढ़ी हो गई, परंतु उसने आतुरता को बूढ़ा नहीं होने दिया।वन-फलों की अनगिनत टोकरियां भरी और औंधी की। पथ बुहारती रही। राह निहारती रही। प्रतीक्षा में शबरी स्वयं प्रतीक्षा का प्रतिमान हो जाती है। जब शबरी को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं उसके आश्रम आए हैं तो वह एकदम भाव विभोर हो उठी और ऋषि मतंग के दिए आशीर्वाद को स्मरण करके गद्गद हो गईं। ( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

वह दौड़कर अपने प्रभु श्रीराम के चरणों से लिपट गईं। इसके बाद शबरी जल्दी से जंगली कंद-मूल और बेर लेकर आईं और अपने परमेश्वर को सादर अर्पित किए। पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार, बेर कहीं खट्टे न हों, इसलिए अपने इष्ट की भक्ति की मदहोशी से ग्रसित शबरी ने बेरों को चख-चखकर श्रीराम व लक्ष्मण को भेंट करने शुरू कर दिए।( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

श्रीराम शबरी की अगाध श्रद्धा व अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर सहज भाव एवं प्रेम के साथ झूठे बेर अनवरत रूप से खाते रहे, लेकिन लक्ष्मण ने झूठे बेर खाने में संकोच किया। उसने नजर बचाते हुए वे झूठे बेर एक तरफ फेंक दिए। माना जाता है कि लक्ष्मण द्वारा फेंके गए यही झूठे बेर, बाद में जड़ी-बूटी बनकर उग आए।

समय बीतने पर यही जड़ी-बूटी लक्ष्मण के लिए संजीवनी साबित हुई। श्रीराम-रावण युद्ध के दौरान रावण के पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाथ) के ब्रह्मास्त्र से लक्ष्मण मुर्छित हो गए और मरणासन्न हो गए। विभिषण के सुझाव पर लंका से वैद्यराज सुषेण को लाया गया। वैद्यराज सुषेण के कहने पर बजरंग बली हनुमान संजीवनी लेकर आए।

श्रीराम की अनन्य भक्त शबरी के झूठे बेर ही लक्ष्मण के लिए जीवनदायक साबित हुए। क्ति-साहित्य में शबरी के फलों की मिठास का बार-बार वर्णन आता है। भगवान राम को इन फलों में जैसा स्वाद मिला, वैसा स्वाद न तो पहले कहीं मिला था और न बाद में ही कहीं मिला। ( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

भीलनी को सामाजिकता की मूलधारा में ले आते हैं। उसके झूठे बेर खाकर राम ने एक वनवासिन का मन ही नहीं रखा, बल्कि उसे पारिवारिकता दी। अपने प्रियजन और परिवारजन का झूठा खाने में संकोच नहीं होता।इसके बाद श्रीराम ने शबरी की भक्ति से खुश होकर कहा, ‘‘भद्रे! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया।

अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनंदपूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो।’’ इस पर शबरी ने स्वयं को अग्नि के अर्पण करके दिव्य शरीर धारण किया और अपने प्रभु की आज्ञा से स्वर्गलोक पधार गईं।महर्षि वाल्मीकी ने शबरी को सिद्धा कहकर पुकारा, क्योंकि अटूट प्रभु भक्ति करके उसने अनूठी आध्यात्मिक उपलब्धि हासिल की थी।

यदि शबरी को हमारी भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक कहें तो कदापि गलत नहीं होगा।शबरी को उसकी योगाग्नि से हरिपद लीन होने से पहले प्रभु राम ने शबरी को नवधाभक्ति के अनमोल वचन दिए । शबरी प्रसंग से यह पता चलता है की प्रभु सदैव भाव के भूखे हैं और अन्तर की प्रीति पर रीझते हं ।

( श्री राम ने दिए सबरी को नवधा – भक्ति के उपदेश )

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